ग़ज़ल
अभी सफ़र मेरा कहा खत्म हुआ, अभी सहर की आहट बाकी है l
है जवां-जवां दिले – धड़कने, जिनमे उम्मीदों की झांकी है ll
वो सज़र हूँ मैं तेरे हांथो का, जिसे आँगन में तूने बहार दी l
मैं फूल तो बहुत खिला चुका, अभी फल गिराना बाकी है ll
उस घर का मैं बासिन्दा हूँ, जो तेरे लबों से हे सजा हुआ l
लो चाँद तो जमीं पे उतर गया, बस कहकशांये आना बाकी है ll
तू रात की कोई रानी है, दिल की तू है गुलमोहर l
न खफा से खुद को रखा करो, तेरी खुशबुऐ बिखरना बाकी है ll
मेरे हाथों पे रख अपने हाथो को, तूने जिस्म की लम्स बड़ाई है l
लो सांसो से सांसे तो मिल गई, तो रूहों का वस्ल बाकी है ll
तेरे इसके इश्के-जुनूं मैं हमने, जमीं-आस्मां को हिला दिया l
मेंरी आयते तेरी आयते, बस खुदा का आना बाकी है ll
स्वयं रचित आनंद धीराण

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